बिहार। मृत्युभोज भोज संस्कार गरीबों पर लगाया गया सामाजिक टैक्स

प्रदीप कुमार नायक, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार। कबीर मिशन समाचार। बिहार


तेरहवीं संस्कार यानी मृत्युभोज की परम्परा का पूर्ण वहिष्कार किया जाना चाहिए।इससे गरीब परिवार पर आर्थिक बोझ पड़ता हैं।लिहाजा आर्थिक रूप से मजबूत परिवार भी इसे नहीं करे ताकि समाज के अन्य लोगों को भी इसे करने के लिए बाध्य न होना पड़े।मृत्युभोज से गरीब परिवार पर और विपदा आ जाती हैं।सही मायने में कहे तो मृत्युभोज अमीरों द्वारा गरीबों पर लगाया गया सामाजिक टैक्स ही हैं।


क्या सम्भव है मौत के बाद पुनः जीवन ? क्या होती है मौत के बाद ? यह सवाल सदा से ही जिज्ञासा का विषय रहा हैं।किन्तु फिर भी आजतक इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया हैं। भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है कि आत्मा अजर अमर हैं।आत्मा का नाश नहीं हो सकता।आत्मा केवल युगों-युगों तक शरीर बदलती हैं।आत्मा का देह त्याग करने के बाद भौतिक जीवन में बहुत से संस्कार किए जाते हैं।जिनमें मृत्युभोज या तेरहवीं हैं।


हिन्दू समाज में जब किसी परिजन की मौत हो जाती हैं,तो अनेक रस्में निभाई जाती हैं। उनमें सबसे आखिरी रस्म के तौर पर मृत्युभोज देने की परम्परा निभाई जाती हैं।जिसके अंतर्गत गाँव, मोहल्ले, पड़ोसी, मित्रगण, रिश्तेदार, आमंत्रित अथितियों के सभी लोगों को भोज देकर भोजन कराया जाता हैं।दशकों पहले मृत्यु होने पर केवल ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता था।लेकिन बदलते समय में समाज के साथ जुड़ाव या लोक लज्जा के कारण भी लोग मृत्युभोज का आयोजन करते हैं।इस भोज के अलग-अलग तरीके हैं।कहीं पर यह एक ही दिन में किया जाता हैं।कहीं पर चलता रहता हैं।कहीं तीसरे दिन से शुरू होकर बारहवें-तेरहवें दिन तक चलता रहता हैं।हमनें यहाँ तक देखा कि कई लोग श्मशान घाट से ही सीधे भोजन करने चल पड़ते हैं।कहीं-कहीं तो मोहल्ले के लोग,मित्र और रिश्तेदार भोज में शामिल होते हैं , कहीं गाँव तो कहीं पूरा क्षेत्र।तब यह हैसियत दिखावें का असर बन जाता हैं।आस-पास के कई क्षेत्र एवं गांवों से लोग गिद्दों की तरह इस घृणित भोज पर टूट पड़ते हैं।मूर्ख तो मूर्ख परन्तु शिक्षित व्यक्ति भी इस जाहिल कार्य में शामिल होते हैं।


अधिकतर लोग मृत्युभोज के विषय में यह धारणा रखते हैं कि मृत्युभोज नहीं करना चाहिए।जबकि दूसरी तरफ कई लोग इसे संस्कार से जोड़कर देखते हैं।हिन्दू धर्म में मुख्य सोलह संस्कार बनाए गए है।जिनमें प्रथम संस्कार गर्भाधान एवं अन्तिम तथा सोलहवाँ संस्कार अंत्येष्टि हैं।इस प्रकार जब सत्रहवाँ बनाया ही नहीं गया तो सत्रहवाँ संस्कार तेरहवीं संस्कार कहाँ से आ गया।लेकिन महाभारत की बात करें तो मृत्युभोज से जुड़ी कई एक कहानी मिलती हैं।जिसके अनुसार श्री कृष्ण ने शोक की अवस्था में करवाए गए भोज को ऊर्जा का नाश करने वाला बताया हैं।महाभारत के अनुशासन पर्व में लिखा है कि मृत्युभोज खाने वाले की ऊर्जा नष्ट हो जाती हैं।महाभारत युद्ध होने को था ।

अतः श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जाकर युद्ध न करने के लिए सन्धि करने का आग्रह किया तो दुर्योधन द्वारा आग्रह ठुकराए जाने पर श्री कृष्ण को कष्ट हुआ और वह चल पड़े।दुर्योधन द्वारा श्री कृष्ण से भोजन करने के आग्रह पर श्री कृष्ण ने कहा कि ” सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनै: ” अर्थात हे दुर्योधन जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो,खाने वाले का मन प्रसन्न हो तभी भोजन करना चाहिए।लेकिन जब खिलाने वाले एवं खाने वाले का मन में पीड़ा हो,वेदना हो,तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन नहीं करना चाहिए।


अब प्रश्न है कि क्या परिवार में किसी प्रियजन की मृत्यु के पश्चात इस प्रकार से भोज देना उचित हैं? क्या यह हमारी संस्कृति का गौरव हैं की हम अपने ही परिजन का मौत को जश्न के रूप में मनाए ?अथवा उसके मौत के पश्चात हुए गम को तरह दिन बाद मृत्युभोज देकर इतिश्री कर दे?क्या परिजन की मृत्यु से हुई क्षति तेरह दिनों के बाद पूर्ण हो जाती हैं अथवा उसके बिछड़ने का गम समाप्त हो जाता हैं?क्या यह सम्भव है कि उसके गम को चंद दिनों की सीमाओं में बांध दिया जाय और तत्पश्चात खुशी का इजहार किया जाय ?क्या यह एक संवेदनशील और अच्छी परम्परा हैं?

हद तब हो जाती है जब एक गरीब व्यक्ति जिसके घर पर खाने को पर्याप्त भोजन भी उपलब्ध नहीं है और उसे मृतक की आत्मा की शांति के लिए मृत्युभोज देने के लिए मजबूर किया जाता हैं और उसे किसी साहूकार या दुकानदार से कर्ज लेकर मृतक के प्रति अपने कर्तव्य पूरे करने के लिए मजबूर होना पड़ता हैं और वह हमेशा के लिए कर्ज में डूब जाता हैं।सामाजिक या धार्मिक परम्परा निभाते निभाते गरीब व्यक्ति और गरीब हो जाता हैं, कितना तर्क संगत हैं यह मृत्युभोज ? क्या तेरहवीं के दिन धार्मिक परम्पराओं का निर्वहन सूक्ष्म रूप से नहीं किया जा सकता।जिसके फिजूल खर्च को बचाते हुए सिर्फ शोक सभा का आयोजन हो। मृतक को याद किया जाय।उसके द्वारा किये गए अच्छे कार्यों की समीक्षा की जाय।उसके न रहने से हुई क्षति का आंकलन किया जाय।सिर्फ दूर से आने वाले प्रशंसकों और रिश्तेदारों को साधारण भोजन की व्यवस्था की जाय।


अत्यधिक खेद का विषय तो यह हैं की जब घर में कोई बुजुर्ग मरता हैं तो उसे ढ़ोल नगाड़ो,बैंड बाजों के साथ श्मशान घाट तक ले जाया जाता हैं, उसके पार्थिक शरीर को ग़ुब्बारे, झंडियों, पताकाओं जैसी अनेक वस्तुओं से सजाया जाता हैं और सब कुछ परम्पराओ के नाम पर तत्परता से किया जाता हैं।मरने वाला बुढ़ा हो या जबान,था तो परिवार का एक सदस्य ही।अतः परिजन के बिछुड़ने पर जश्न का माहौल क्यों?इन परम्पराओं को निभाने वालों में कम पढ़े लिखे या पिछड़े वर्ग से ही नहीं होते।बल्कि अच्छे परिवारों से और उच्च शिक्षित व्यक्ति भी शामिल होते हैं।क्या यह बिना सोचे समझे परम्पराओं को निभाते जाना ,लकीर पीटते जाना नहीं हैं।क्या यह हमारे रिश्तों में संवेदनशीलता का परिचायक माना जा सकता हैं ? क्या इन दकियानूसी कर्मो में फंसे रहकर हम विकास कर पाएंगे।विश्व की चाल में चाल मिला पाएंगे ?


राजस्थान मृत्युभोज निवारण अधिनियम 1960 की धारा दो में परिभाषित मृत्युभोज से संबंधित कोई भी कृत्य नहीं करने के आदेश दिए हैं।मृत्युभोज एक कानूनन अपराध हैं।प्रशासन को इस पर सख्ती करनी चाहिए।


मृत्युभोज की कुप्रथा हर समाज के लिए घातक एवं एक वीभत्स कुरीति हैं।आखिर यह मौन हम कब तोड़ेंगे? अब समय आ गया है कि समाज अनीति और अन्याय रूपी फ़ायदे लेना बन्द करें तथा आंसुओं से भीगी दानव यानी मृत्युभोज बारहवीं या तेरहवीं जैसी सभी कुप्रथाओं को एक सिरे से वहिष्कार करें।


वर्षो पहले कुछ स्वार्थी लोगों ने भोले-भाले इंसानों में एक कुरीति मृत्युभोज को फैलाई।मानव विकास के रास्ते में यह गंदगी के रूप में कैसे पनप गई यह समझ से परे हैं।जानवर भी अपने साथी के मरने पर मिलकर दुःख प्रगट करते हैं।लेकिन इंसानी बेईमान दिमाग की करतुते देखों कि यहाँ किसी व्यक्ति के मरने पर उसके साथी,सगे संबंधी,सामाजिक लोग भोज करते हैं।भोज और मिठाइयां खाते हैं।यह एक सामाजिक शर्मनाक परम्परा एवं बुराई हैं।इसको खत्म करने के लिए हम सभी को जागरूक होकर काम करना होगा।

लेखक -स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं ,समाचार पत्र एवं चैनेल में अपनी योगदान दे रहे हैं।
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