भोपाल। जलवायु परिवर्तन के कारण घटते रोजगार के अवसरों एवं खेती का बढ़ता नुकसान भविष्‍य की चुनौती

वैश्विक सूखा एवं बाढ़ जन आयोग के जल संवाद में किसानों ने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते संकट की समस्‍याएं बया की। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर मंथन हेतु आज एक राज्‍य स्‍तरीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन परमार्थ और समर्थन संस्‍था के संयुक्‍त तत्‍वाधान में किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन पीपुल्स वर्ल्ड कमीशन के उस उद्देश्‍य के तारतम्‍य में किया गया जिसमें प्राकृतिक आपदाओं के कारण समुदाय को होने वाली परेशानियों और चुनौतियों को समझने के लिए दुनिया भर में सूखे और बाढ़ के मुद्दों पर स्‍थानीय लोगों की आवाज सुनने और विश्‍लेषण का निर्णय लिया गया है। इस आयोग की अध्‍यक्षता की जिम्‍मेदारी मैग्सेसे पुरस्कार और स्टॉकहोम जल पुरस्कार से सम्‍मानित डॉ राजेंद्र सिंह को सौंपी गई है। यह आयोग बाढ़ और सूखे की परिस्थितियों से निपटने के लिए सिफारिश देने का काम करेगा।

इस कार्यक्रम में प्रदेश के 9 से अधिक जिलों के किसानों, स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं के प्रतिनिधियों, शैक्षणिक और प्रबंधन संस्‍थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विभिन्‍न जिलों से आये किसानों ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि पिछले कुछ सालों में बाढ़-सूखा सहित अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति दोनों में इजाफा हुआ है। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता भारत में कृषि में परंपरागत बीजों के संरक्षण में अग्रणी कार्य करने वाले पद्मश्री श्री बाबूलाल दहिया ने की। अनेक किसानों ने बताया कि बढ़ती हुई प्राकृतिक आपदाओं के कारण खेती में जोखिम बढ़ता जा रहा है। लगातार आने वाली बाढ़, सूखा या ओलावृष्टि से फसल खराब हो जाती हैं और किसान कर्ज में डूबता जाता है। अनेकों संस्‍थागत व्‍यवस्‍थाएं जो किसानों को मददगार हो सकती हैं, जैसे कम ब्‍याज दरों पर समय से कर्ज, खाद-बीज, फसल बीमा का उचित भुगतान, सिंचाई के लिये समय पर बिजली की उपलब्‍धता आदि से उत्‍पन्‍न कठिनाईयों पर चर्चा की। प्रगतिशील किसानों ने जलवायु परिवर्तन के जोखिम को कम करने के लिए उपयोग किए जा रही नई पद्धतियों, फसल विविधता और पारम्‍परिक खेती के उदाहरणों को प्रस्‍तुत किया। श्री लोकेन्‍द्र ठक्‍कर, डायरेक्‍टर एप्‍को ने अपने उद्बोधन में किसानों द्वारा किए जा रहे पर्यावरणीय नुकसान की ओर इंगित किया एवं किसानों को जलवायु परिवर्तन रोकने में अपना योगदान समझने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया।

श्री संजीव गुप्‍ता, प्राध्‍यापक माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्‍वविद्यालय ने अपनी अनुशंसा में कहा कि हमें जन भागीदारी को बढ़ाने और सामुदायिक विफलता से सीख लेने की जरूरत है। डॉ. सुपर्वा पटनायक, प्रोफेसर अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रही हैं। मध्‍यप्रदेश की परम्‍परागत खेती के तरीकों जैसे कोदों, कुटकी आदि को जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में उपयोगी बताया।

डॉ. जार्ज वी. जोसेफ, संयुक्‍त संचालक आपदा प्रबंध संस्‍थान ने कहा कि प्रभावितों तक ठीक से और समय पर राहत नहीं पहुंच पा रही है। इसके लिए समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन को बढ़ावा देना होगा। अच्‍छे उदाहरणों को एकत्र करने की आवश्‍यकता है। कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे श्री बाबूलाल दहिया ने कहा खेती में बढ़ता पानी का उपयोग भविष्‍य की सबसे बड़ी चिन्‍ता है, इसको हमें समझना होगा। भले ही खेती में उत्‍पादन बढ़ा है लेकिन किसान पहले पेट की खेती करते थे अब सेठ की खेती करने लगे हैं। जिसने किसानों को तबाह कर दिया है। खेती अब जोखिम वाली हो गई है। इससे निपटने के लिए परम्‍परागत खेती ही हमें मदद कर सकती है। डॉ योगेश, कार्यकारी निदेशक समर्थन संस्‍था ने कहा कि अब विमर्श के अवसर कम हो रहे हैं जिन्‍हें बढ़ाने की आवश्‍यकता है।

स्‍थानीय समुदाय के अनुभवों को साझा करने के अवसरों को बढ़ाने की जरूरत है। श्री संजय सिंह , प्रमुख परमार्थ संस्‍था ने कहा कि वैश्विक बाढ़-सुखाड़ जन आयोग की स्‍थापना पिछले दिनों स्‍टॉक होम में विश्‍व जल सप्‍ताह के दौरान दुनिया भर के विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों को रोकने के लिए की गई है। जिसका उद्देश्‍य भारत सहित दुनिया भर के देशों पर पड़ने वाले प्रभावों के संदर्भ में एक वैश्विक रिपोर्ट को तैयार करना और इसके लिए विभिन्‍न हितग्राहियों के साथ सार्थक संवाद स्‍थापित करना। जिसके तहत आज मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल में पहले जन संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यहां से निकली अनुशंसाओं को राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर ले जाया जायेगा।