मध्यप्रदेश राजगढ़

22 जून कबीर जयंती पर विशेष, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत संत कबीर

22 जून कबीर जयंती पर विशेष, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत संत कबीर

कबीर मिशन समाचार

                                          ©सन्तोष मालवीय

सामाजिक क्रांति के अग्रदूत संत कबीर 626 वर्ष पूर्व काशी के लहर तालाब में कमल कुंज के बीच नीरु और नीमा नामक जुलाहे दम्पति को एक शिशु के रूप में प्राप्त हुये थे। “कबीर मंसूर ” के अनुसार उनका जन्म संवत 1455 विक्रमी ज्येष्ठ सुदी पूर्णिमा सोमवार के दिन होना पाया जाता है। ( ईसवीं सन् 1398) कबीर के माता पिता जन्म, जाती, आदि का उनसे सम्बंधित कोई ठोस सबूत नहीं हैं। नीरु और नीमा एक गरीब जुलाहे थे, उनके कोई संतान नहीं थी। इसी कारण इस दम्पति ने बालक कबीर का लालन -पालन किया।


पन्द्रहवीं शताब्दी के इस महान संत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालना मानो सूर्य को दीपक दिखाना है । जाति, कुल‌, सामाजिक स्तर आदि से संतों की महानता का कोई संबंध नहीं हैं। वास्तव में संत सबके होतें हैं। उनकी कोई जाति, कोई राष्ट्रीयता नहीं होती हैं न ही मनुष्य के बनाये हुए ऐसे भेदभाव को मंजूर करते हैं। कबीर स्वयं कहते हैं कि वे न हिन्दू हैं न मुसलमान वे सभी मनुष्यों के समान पांच तत्वों की देह धारण किये हुए हैं। जिसके अंदर अदृश्य आत्मा निवास करती हैं‌। देखें –

हिन्दू कहूँ तो मैं नहिं, मुसलमान भी नाहि,
पांच तत्व का पूतला गैबी खेलै मांहि।।

कबीर अंधविश्वास, मूर्ति पूजा बाहृय आडम्बर के घोर विरोधी थे। उन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपनी वाणी से कुरेदा हैं और उनकी तीखी आलोचना भी की हैं। देखिए –

मूरति धरी धंधा रचा पाहन का जगदीश,
मुख से वह बोले नहीं खोटा बिसवा बीस।
पाहन पूजै तो हरि मिले, तो मैं पूजू पहार,
या से तो चाकी भली, पीस खाये संसार‌।
इसी तरह मुस्लिमो के लिए भी कबीर कहते हैं –

कांकड़ पाथर बीन के मसजिद लयी बनाय,
ता चड़ी मुल्ला बाग दे, बहरा हुआ खुदाय।
यह सब झूठी बंदगी, बिरिया पांच नमाज,
सांचहि मारै झूठिपढ़ि, काजी करै अकाज।
कबीर‌ लगभग चार – पांच साल के हुए तो समस्त जुलाहे एकत्रित हो कर कहने लगे कि हे! नीरु हमारे रसूल की आज्ञा के अनुसार अब तूम्हें अपने पुत्र‌ का खतना‌( सुन्नत) कराना होगी। यथा –
बेटे की तुम सुनति कराओ -पंचों का हाथ धुलाओं।
काजी तुलना को बुलवाओ, गैनी और शराब मंगाओं।
इस प्रकार की उनकी बात सुनकर नीरु ने कान पर हाथ रख कर कहा –
नीरु कहें सुन्नति करवाओं पै नहिं गैनी गला कटाओं ।
जाति समाज के लोगों ने नीरु से कहा कि, तुम गाय काटों और शराब का इंतजाम करों। तब नीरु ने कहा कि भाई मैं गाय नहीं कटवा सकता, अगर मैंने ऐसा किया तो मेरा बेटा कबीर घर कभी नहीं आयेगा -देखें –

नीरु कहें सुनो रे भाई! ऐसो करौ तो पूत गवांई ।
एक बार आमिर आना -तेहि कारन सुत भया बिगाना ।
नीरु सुन्नत का सामान इकट्ठा करने लगा‌ और उधर मुल्ला काजियों के साथ मिलकर उसके जाति के लोगों ने एक गाय मंगाकर चुपचाप जिबह करने का निश्चय किया‌। नीरु इस काण्ड से एक दम अंजान था। इधर सब सामान दुरुस्त हो जाने पर जब नाई उस्तरा लेकर कबीर साहेब का सुन्नत करने गया तब कबीर साहेब ने लंगूटी खोल कर नाई को पांच लिंग दिखला कर कहा इसमें से जो तेरी इच्छा हो काट ले। नाई भयभीत होकर भाग गया। नाई के भाग जाने पर कबीर बच्चों के साथ खेलने चले गये थे। सो खेल छोड़ कर वहाँ से दौड़े और गौहत्या के स्थान पर पहुँच कर काजी से कहा –
हो काजी यह किन फरमाये, किनके मता तुम छुरी चलाये।
जिनका चीर जु पीजिए तिसको कहिये माय।
तिस पर छुरी चलायु किम महदिमाग दिढाय ।


कबीर साहेब ने मृत गाय के पीठ पर हाथ फेरा वैसे ही वह गाय जीवित होकर उठ बैठी फिर कबीर उसको लेकर गंगा पर गये और गाय को गंगा जल से स्नान करा‌ कर नगर में स्वतंत्र फिरने के लिए छोड़ दिया। उस दिन से वह गाय कबीर की गाय के नाम से पूरी काशी में प्रसिद्ध हो गयी। सब लोग उसका आदर करने लगे। कबीर ने इसी दिन से नीरु का घर त्याग दिया और गंगा किनारे एक कुटिया बना कर रहने लगे। उसी स्थान को अब ” कबीर चौरा ” कहते हैं जहाँ आज बड़ा सा मौहल्ला बसा हुआ है और कबीर पंथियों का बड़ा भारी स्थान है। कबीर साहेब के वहाँ रहने पर नीमा और नीरु भी वही आकर रहने लगे, उन्होंने अपना पहला घर छोड़ दिया।


कबीर साहेब की उम्र 120 वर्ष की हो गयी थी और शरीर भी जर – जर अवस्था में था। तब कबीर साहेब जी ने मगहर में अपना शरीर छोड़ने की बात अपने शिष्यों से की। शिष्यों के विरोध के बावजूद कबीर ने अपना शरीर मगहर में सन् 1518 में 120 वर्ष की आयु में छोड़ा। कबीर ने हिन्दू और मुसलमान दोनों की परिपाटियों का विरोध किया था तथा कयी बार कहते थे कि मैं न हिन्दू हूँ न मुसलमान‌ परंतु फिर भी उनके शिष्यों में उनके अंतिम संस्कार को लेकर मतभेद हो गया। राजा वीर सिंह बघेला के नेतृत्व में हिन्दू, कबीर के शव को अग्नि संस्कार करना चाहते थे, तो नवाब बिजली खान और मुस्लिम शिष्य उसे दफनाना चाहते थे। दोनों पक्षों में विवाद इतना बड़ा कि झगड़े की नौबत आ गयी। उसी समय कुछ शिष्यों ने कबीर के शव की ओर सबका ध्यान आकर्षित किया कहते हैं कि , कपड़ा हटाने पर शव के स्थान पर वहाँ फूलों का ढैर मिला। कबीर के इस महान जीवन का यह उचित समापन था।

                                कवि, साहित्यकार‌ तथा     सम्पादक -निर्विन्ध्या ,  "पितृ महिमा " पचोर  (म.प्र.) मोबाइल 9329169291

About The Author

Related posts