उज्जैन नरवाई जलाना खेती के लिये आत्मघाती कदम, सम्बन्धित किसान को पर्यावरण क्षतिपूर्ति की राशि देना पड़ेगी

उज्जैन 15 मार्च। जिले के कृषकों से अपील की जाती है कि गेहूं एवं अन्य फसलों को काटने के बाद बचे हुए फसल अवशेष (नरवाई) जलाना खेती के लिये आत्मघाती कदम है। वर्तमान में जिले में लगभग गेहूं फसल की कटाई प्रारम्भ हो गई है। गेहूं फसल की कटाई के पश्चात सामान्य तौर पर किसान नरवाई में आग लगा देते हैं, जिससे पर्यावरण में प्रदूषण के साथ-साथ मिट्टी की संरचना भी प्रभावित होती है। इस संबंध में म.प्र. शासन के नोटिफिकेशन में निषेधात्मक निर्देश व राष्ट्रीय हरित अधिकरण के प्रकरण तथा प्रमुख सचिव किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के निर्देश व उनके पालन की प्रक्रिया सुनिश्चित की जाना है। निर्देशों के उल्लंघन किये जाने पर व्यक्ति/निकाय को नोटिफिकेशन प्रावधान तथा निर्देशानुसार पर्यावरण क्षतिपूर्ति की राशि देना होगी।

किसान को पर्यावरण क्षतिपूर्ति की राशि देना होगी

किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के उप संचालक ने यह जानकारी देते हुए बताया कि 2 एकड़ से कम भूमि रखने वाले किसान को रू. 2500/- प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देय होगी। 2 एकड से अधिक किन्तु 5 एकड से कम भूमि रखने वाले किसान को रू. 5000/- प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राषि देय होगी। 5 एकड से अधिक भूमि रखने वाले किसान को रू. 15000/- प्रति घटना पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि देय होगी। कम्बाईन हार्वेस्टर से कटाई के उपरांत फसल अवशेषों में आग लगाने की घटनाओं को देखते हुए रबी की कटाई में कम्बाईन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मेंनेजमेंट सिस्टम या स्ट्रॉरीपर का उपयोग करके किसान अपनी फसल के अवशेषों से भूसा प्राप्त कर सकते हैं।

नरवाई जलाने से अनेक प्रकार की हानि

खेत में गेहूं एवं अन्य फसलों के कृषि अपशिष्टों को जलाने से किसानों के खेतों में निम्न हानियां हो सकती है, जैसे- भूमि में उपलब्ध जैव विविधता समाप्त हो जाती है। भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीव जलकर नष्ट हो जाते है। सूक्ष्म जीवों के नष्ट होने के फलस्वरूप जैविक खाद का निर्माण बंद हो जाता है। भूमि की ऊपरी पर्त में ही पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध रहते है। आग लगाने के कारण पोषक तत्व जलकर नष्ट हो जाते है। भूमि कठोर हो जाती है, जिसके कारण भूमि की जल धारण क्षमता कम हो जाती है और फसलें सूखती है। खेत की सीमा पर लगे पैड़ पौधे (फल, वृक्ष आदि) जलकर नष्ट हो जाते है। पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है। वातावरण के तापमान में वृद्धि होती है, जिससे धरती गर्म होती है। कार्बन से नाईट्रोजन तथा फास्फोरस का अनुपात कम हो जाता है। केंचुए नष्ट हो जाते है। इस कारण भूमि की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। नरवाई जलाने से जल-धन की हानि होती है। अतः उपरोक्त नुकसान से बचने के लिये किसान भाई नरवाई में आग न लगायें।

नरवाई जलाने पर होगी कार्यवाही

कलेक्टर द्वारा नरवाई जलाने पर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी

नरवाई का उपयोग निम्न तरीकों से किया जा सकता है- नरवाई जलाने की अपेक्षा अवशेषों और डंठलों को एकत्र कर जैविक खाद जैसे- भू-नाडेप, वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जाए तो वे बहुत जल्दी सड़कर पोषक तत्वों से भरपूर कृषक स्वयं का जैविक खाद बना सकते है। खेत में कल्टीवेंटर, रोटावेटर या डिस्क हेरो आदि कि सहायता से फसल अवशेषों को भूमि में मिलाने से आने वाली फसलों में जीवांश खाद कि बचत कि जा सकती है। पशुओ के लिए भूसा और खेत के लिए बहुमूल्य पोषक तत्वों कि उपलब्धता बढने के साथ मिट्टी की संरचना को बिगडने से बचाया जा सकता है। कम्बाईन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मेंनेजमेंट सिस्टम को सामान्य हार्वेस्टर से गेहूं कटवाने के स्थान पर स्ट्रारीपर एवं हार्वेस्टर का प्रयोग करें। खेतों में नरवाई जलाने का कृत्य जिला कलेक्टर द्वारा प्रतिबंधित किया गयाहै। नरवाई में आग लगाने पर पुलिस द्वारा प्रकरण भी कायम किया जा सकता है।