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स्वयं को बुद्धिस्ट अंबेडकरवादी बताकर, सर्वधर्म विश्व शांति यात्रा एवं श्रीलंका से नकली फर्जी बुद्ध की अस्थियों के समाज को दर्शन कराकर धर्म की आड़ में राजनीतिकरण कितना सार्थक हैॽ

स्वयं को बुद्धिस्ट अंबेडकरवादी बताकर, सर्वधर्म विश्व शांति यात्रा एवं श्रीलंका से नकली फर्जी बुद्ध की अस्थियों के समाज को दर्शन कराकर धर्म की आड़ में राजनीतिकरण कितना सार्थक हैॽ

विजय बौद्ध, संपादक दि बुद्धिस्ट टाइम्स भोपाल मध्य प्रदेश, संपादकीय।

देश के बौद्धो की इतनी विकराल समस्या है, कि उन्हें हम भारत का संविधान निर्माण होने के बाद से भी सुलझा नहीं सके हैं। परंतु मैं वर्षों से देख रहा हूं। स्वयं को अंबेडकरवादी बुद्धिस्ट होने का दम भरने वाले तथाकथित बुद्धिस्ट अंबेडकरवादी, बिना उद्देश्य के अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन तो कुछ लोग बौद्ध मेले लगा रहे हैं। और मारवाड़ी सुरेश अग्रवाल बनिया हिंदू की पत्नी डिप्टी कलेक्टर के पद पर आसीन निशा बांगरे बैतूल जिले के आमला विधानसभा की आरक्षित सीट पर, छोटे से स्थान पर सर्वधर्म विश्वशांति यात्रा निकाल रही है।

और उस यात्रा में श्रीलंका से भगवान बुद्ध की नकली और फर्जी तरीके से बुद्ध की अस्थियां लाकर प्रदर्शन कर रही है। और फिल्मी नाचिया गगन मलिक बहुरूपिया बौद्ध राष्ट्रों से बुद्ध की मूर्तियों की तस्करी व्यापार कर रहा है। गगन मलिक फाउंडेशन से जुड़े महाठग नितिन गजभिए एवं महू इंदौर के मोहनराव वाकोड़े, स्मिता वाकोड़े द्वारा बुद्ध के मूर्तियों के व्यापारीकरण, धोखाधड़ी तथा गगन मलिक फाउंडेशन के नाम से अवैध चंदा वसूली के खिलाफ, बोधिसत्व बाबा साहेब टुडे मासिक पत्रिका के संपादक बुद्ध अंबेडकर कल्याण एसोसिएशन लखनऊ उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष ज्ञानप्रकाश जख्मी की ओर से अधिवक्ता आरआर जैसवार ने इन्हें 18/6/ 2023 को विधिक नोटिस भेजा है।

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने हिंदू धर्म के भेदभावपूर्ण रवैया से दुखी होकर नासिक केवला में 1935 में घोषणा की थी, कि मैं हिंदू धर्म में जन्म लिया हूं, यह मेरे बस की बात नहीं नहीं है। परंतु मैं हिंदू धर्म में रहकर मरूंगा नहीं,, उसके बाद डॉक्टर अंबेडकर ने दुनिया के सभी धर्मों का 21 वर्षों तक गहन अध्ययन किया था। तब उन्होंने अपने जिंदगी के अंतिम पड़ाव में 14 अक्टूबर 1956 को घोषणा के किस वर्ष बाद नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ ऊंच-नीच भेदभाव छुआछूत पर आधारित हिंदू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। ठीक उसके 5 वर्ष पूर्व ही आजाद भारत का संविधान लिख दिया था। उसमें संविधान की धारा 25 2b में उल्लेख कर दिया था, कि सिख जैन और बौद्ध, हिंदू धर्म के अधीन होंगे। तब से बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म के अधीन है। भारत देश के बौद्धों की स्वतंत्र पहचान नहीं है। देश के हिंदू मुस्लिम सिख ईसाईयो का पर्सनल ला मैरिज एक्ट है।

परंतु बौद्धो का पर्सनल ला मैरिज एक्ट नहीं है। बौद्धो का मैरिज एक्ट नहीं होने के कारण विवादित विवाह के मसलों पर न्यायालय, बौद्धो के विवाह को गैरकानूनी और उनके बच्चों को नाजायज औलाद बताता है।इस गंभीर समस्याओं पर देश के जागरूक अंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों ने सन 1994 में एक ऐतिहासिक आंदोलन चलाया था। अविभाजित मध्यप्रदेश वर्तमान छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर में एक सम्मेलन आयोजित किया गया था, और उस सम्मेलन में डॉक्टर बाबा साहब अंबेडकर की पत्नी सविता अंबेडकर को आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन में महाराष्ट्र बांबे हाईकोर्ट के न्यायाधीश भाऊ वाहने एवं प्रख्यात अंबेडकरवादी,, डॉक्टर प्रोफेसर प्रदीप आगलावे सहित देश के तमाम अंबेडकरवादी बुद्धिजीवी शामिल थे।

यह आंदोलन संविधान की धारा 25 2b में संशोधन के लिए किया गया था। उक्त आंदोलन सम्मेलन का नेतृत्व आरक्षण और सामाजिक न्याय पर पीएचडी, उच्च शोधार्थी, डॉक्टर आर,एल कानडे अधिवक्ता ने किया था। उसके बाद 10 वर्ष पूर्व यानीकि 2013 से दिल्ली निवासी आसाराम गौतम वर्तमान अभय रत्न बौद्ध के नेतृत्व में देश के बौद्ध संगठनों की राष्ट्रीय समन्वय समिति बोधगया भारत,, बौद्ध धर्म संसद का गठन किया गया था। जिसका मैं राष्ट्रीय सचिव रहा हूं। उस बौद्ध धर्म संसद द्वारा लगातार देश के बौद्धौ की आवाज उठाई गई। संविधान की धारा 25 2b में संशोधन की मांग की गई। तथा बौद्धो की स्वतंत्र पहचान के लिए, बुद्धिस्ट पर्सनल ला मैरिज एक्ट बनाने के लिए संघर्ष किया गया। वह अभी भी जारी है। बुद्धिस्ट पर्सनल ला 1991 में महाराष्ट्र के बुद्धिस्ट वकील ने राज्यसभा में पेश किया था।

उसे लोकसभा में बहस के लिए रखा नहीं गया। उसके कारण बुद्धिस्ट मैरिज एक्ट आज तक नहीं बन पाया है। इसका मुख्य कारण भी यह है कि देश की संसद में कोई भी बौद्ध सांसद नहीं है। जो बौद्धो की आवाज उठा सके। संविधान की धारा 25 2b में संशोधन नहीं होने के कारण ही दुनिया के बौद्ध राष्ट्रों का आस्था केंद्र सिद्धार्थ गौतम बुद्ध की ज्ञान स्थली बोधगया महाबोधी बुद्ध विहार मैनेजमेंट कमेटी, 8 लोगों की कमेटी में 3 बौद्ध है, और 5 हिंदू और कलेक्टर कमेटी का अध्यक्ष होता है। वह कमेटी वर्षों से ब्राह्मणों हिंदुओं के कब्जे में है। इसे मुक्त किए जाने बोधगया महाबोधि विहार मुक्ति आंदोलन चलाया गया। परंतु वह आज भी हिंदुओं के कब्जे में है। वह मुक्त नहीं हो सका।

अब आंख खोलकर तथाकथित बुद्धिस्ट अंबेडकरवादी पढ़ें कि, बौद्ध धर्म हिंदू धर्म के अधीन क्यों हैॽ बौद्धो की स्वतंत्र पहचान क्यों नहीं है ॽ क्यों बौद्धो का पर्सनल ला मैरिज एक्ट नहीं हैॽ क्यों बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म के अधीन है ॽ श्रीलंका से नकली और फर्जी भगवान बुद्ध की अस्थियां भारत में लाकर बौद्धो को दर्शन करा देने से कोई अंबेडकरवादी बुद्धिस्ट नहीं बन जाता। हिंदू धर्म को कलंक बताने वाले दुनिया के महानतम विद्वान संविधान के रचयिता बोधिसत्व डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने आखिर संविधान की धारा 25 2b के अंतर्गत बौद्ध धर्म को हिंदू धर्म के अधीन क्यों रखा ॽ तो मैं यह बताना चाहता हूं। जब आजाद भारत का संविधान डॉक्टर अंबेडकर लिख रहे थे। तब डॉक्टर अंबेडकर हिंदू ही थे। उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पहले ही इस देश का संविधान लिख दिया था। इसलिए चाह कर भी उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वतंत्र धर्म घोषित नहीं कर सका।

उन्हें हिंदू धर्म के अधीन रखना पड़ा, क्योंकि उस समय डॉक्टर अंबेडकर स्वयं हिंदू थे। डॉक्टर अंबेडकर ने भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 को लिख दिया था। 26 जनवरी 1950 को वह संविधान लागू होने के 6 वर्ष बाद यानीकि 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। ,,,,,यानेकी हिंदू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण किया था। इतनी विकराल समस्या भारत देश के बौद्धो के सामने हैं। बौद्धौ की स्वतंत्र पहचान नहीं है। बुद्धिस्ट पर्सनल ला मैरिज एक्ट नहीं है।

बोधगया महाबोधि महाविहार वर्षों से हिंदुओं के कब्जे में है। इसे मुक्त कराने, बौद्धो की स्वतंत्र पहचान दिलाने, संविधान के आर्टिकल 25 2b में संशोधन किए जाने, की संवैधानिक लड़ाई लड़ने के बजाय,, स्वयं को अंबेडकरवादी बुद्धिस्ट बताने वाली हिंदू मारवाड़ी सुरेश अग्रवाल की पत्नी डिप्टी कलेक्टर निशा बागरे,, बुद्ध मूर्तियों के तस्कर गगन मलिक के साथ मिलकर अपने राजनीतिक स्वार्थ की मंशा को लेकर एक छोटे से कस्बे बैतूल जिले के आमला विधानसभा की आरक्षित सीट, छोटे से स्थान पर श्रीलंका से फर्जी नकली बुद्ध की अस्थियां लाकर सर्वधर्म विश्व शांति यात्रा निकाल रही है। और उस यात्रा एवं फर्जी तरीके से ग्रह प्रवेश में उपस्थिति के लिए सरकार द्वारा मंजूरी नहीं दिए जाने पर अपने डिप्टी कलेक्टर पद से इस्तीफा दे रही है।

यह सर्व धर्म के लोगों विशेषकर अनुसूचित जाति, बौद्ध समाज को गुमराह किए जाने का सुनियोजित राजनीतिक षड्यंत्र है। यह सर्व धर्म विश्व शांति यात्रा और श्रीलंका से बुद्ध की नकली और फर्जी अस्थियों का सहारा लेकर स्वयं को राजनीतिक रूप से स्थापित किए जाने का घृणित कृत्य है। एक तरफ संविधान को साक्षी रहकर मारवाड़ी सुरेश अग्रवाल बनिया हिंदू लड़के से अंतरजाति विवाह किए जाने की बड़े गर्व से बात करती है, और दूसरी तरफ जिस संविधान को साक्षी रखकर अंतरजाति विवाह की है, वह संविधान ही खतरे में है। उस संविधान को बचाने की लड़ाई के लिए इस्तीफा देने के बजाय श्रीलंका से फर्जी नकली बुद्ध की अस्थियों के दर्शन एवं अपने आधे अधूरे घर प्रवेश किए जाने की मंजूरी नहीं मिलने के लिए इस्तीफा देती है। मौजूदा देश की सरकार चलाने वाले ,, आरएसएस के सर कार्यवाहक सुरेश जोशी भैयाजी खुलेआम कहते हैं।

भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए वर्ण व्यवस्था को लागू करना,, और संविधान को बदलना हमारा मुख्य उद्देश्य है। हिंदू धर्म संसद, हिंदू साधु-संत आए दिन रोज धर्मनिरपेक्ष भारत, को हिंदूराष्ट्र ब्राह्मण राष्ट्र,, बनाने और संविधान बदलने का ढिंढोरा पीट रहे है। सन् 2014 से देश, संविधान से नहीं बल्कि मनुस्मृति के अनुरूप चलाया जा रहा है। देश का संविधान, लोकतंत्र खतरे में है। बौद्ध धर्म एवं बौद्ध विरासतें खतरे में है। साकेत जो बौद्ध स्थल, बौद्ध विरासत को अयोध्या राम जन्मभूमि घोषित कर, वहां स्थित बावरी महाबुद्ध विहार को नष्ट कर, अब सुप्रीम कोर्ट का असंवैधानिक सहारा लेकर उस बुद्ध के हृदय स्थल, उनके छाती पर काल्पनिक राम का मंदिर बनाया जा रहा है।

जबकि पुरातत्व विभाग द्वारा कई बार खुदाई एवं समतलीकरण के दौरान उस स्थल से सैकड़ों भगवान बुद्ध की मूर्तियां, सम्राट अशोक कालीन अवशेष मिले हैं। निशा बांगरे ने आज तक बौद्ध विरासत को बचाने कोई लड़ाई नहीं लड़ी। बौद्धो के किसी भी संवैधानिक अधिकारों के लिए निशा बांगरे द्वारा आज तक कोई लड़ाई लड़ी नहीं गई है। अचानक स्वयं को बुद्धिस्ट बताने की होड़ में बौद्धो का सम्मेलन नहीं,, सर्व धर्म शांति यात्रा निकाल रही है। रहा सवाल अंतरजातिविवाह का, तो, कुछ लोग कहते हैं, कि डॉक्टर अंबेडकर ने अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया था।

तो बिल्कुल गलत है। डॉ बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर ने कहा था, जाति प्रथा को तोड़ने का वास्तविक तरीका अंतर्जातीय भोज या अंतर्जातीय विवाह नहीं है। बल्कि वह धार्मिक भावनाओं को नष्ट करना है, जिन पर जाति प्रथा की नींव रखी गई है। निशा बांगरे ने सुरेश अग्रवाल मारवाड़ी बनिया हिंदू लड़के से अंतरजातिविवाह की है। इसलिए उसने और उसके पति ने अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन नहीं,, बल्कि सर्व धर्म शांति यात्रा निकाली है। जिसका कोई उद्देश्य नहीं है। और श्रीलंका से भगवान बुद्ध की नकली फर्जी अस्तियां आमला में लाकर बौद्ध समाज को दर्शन कर उन्हें मूर्ख बनाने का पाप किया है। 24 जून के पहले यह बताया जा रहा था, कि श्रीलंका से बुद्ध की अस्थियां लाई जा रही है।

जब मैंने तुरंत ही लिख कर इसका पर्दाफाश किया कि श्रीलंका में बुद्ध की अस्थियां है ही नहीं, मात्र श्रीलंका के कैंडी बुद्ध विहार में भगवान बुद्ध का दांत है। तो दूसरे दिन गगन मलिक फाउंडेशन निशा बांगरे ने कह दिया कि बुद्ध की अस्थियां श्रीलंका से नहीं बल्कि थाईलैंड से आ रही है। इस तरह से बौद्ध समाज को गुमराह कर निशा बांगरे और उनके पति मारवाड़ी सुरेश अग्रवाल एवं गगन मलिक फाउंडेशन गगन मलिक ने समाज और शासन प्रशासन को धोखा दिया है।

मैं मध्यप्रदेश शासन और पुरातत्व विभाग भारत सरकार से मांग करता हूं, कि आमला में जिला प्रशासन के बिना अनुमति के सर्वधर्म विश्वशांति यात्रा एवं श्रीलंका, थाईलैंड से बुद्ध की अस्थियां लाई गई, उन अस्तियों की वास्तविकता की उच्चस्तरीय जांच की जाए, और उस जांच में मुझे एवं बौद्ध धर्म के जानकार विद्वान भंते प्रज्ञाशील महाथरो जिन्होंने कई बौद्ध राष्ट्रों का भ्रमण किया है। तथा बोधगया मैनेजमेंट कमेटी में भी रहे हैं, उन्हें भी शामिल किया जाए। क्योंकि श्रीलंका में भगवान बुद्ध की अस्थियां ही नहीं है। और रहा सवाल थाईलैंड का तो वहां वट साकेत गोल्डन माउंटबेटन बैंकॉन्ग में बुद्ध की अष्टधातु भारत से प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। वह अष्टधातु मौजूद है।

वह थाईलैंड वट साकेत गोल्डन माउंट बैंकॉन्ग से गगन मलिक फाउंडेशन निशा बांगरे एवं उसके पति सुरेश अग्रवाल को किस हैसियत से थाईलैंड सरकार ने भारत मध्य प्रदेश बैतूल जिले के आमला में बिना सरकार जिला प्रशासन की अनुमति के कैसे सौंप दियाॽ क्या गगन मलिक फाउंडेशन भारत सरकार का कोई जिम्मेदार प्रतिनिधि हैॽ जिस जिले में प्रदेश में बुद्ध की अस्थियां श्रीलंका, थाईलैंड से लाई गई, उस कार्यक्रम को जिला प्रशासन सरकार ने अनुमति क्यों नहीं दियाॽ इसका मतलब है, कि बुद्ध की अस्थियों की जानकारी भारत सरकार एवं राज्य सरकार को नहीं थी।

मैंने बोधगया महाबोधि महाविहार मुक्ति आंदोलन समिति के द्वारा महाबोधि महाविहार प्रबंध कार्यकारिणी समिति बीटीएमसी कार्यालय के प्रभारी अधीक्षक और प्रथम बौद्ध सदस्य सचिव जिन्होंने श्रीलंका थाईलैंड सहित कई बौद्ध राष्ट्रों का भ्रमण किया है ऐसे बौद्ध विद्वान भंते प्रज्ञाशील महाथेरों से गगन मलिक फाउंडेशन निशा बांगरे उसके पति सुरेश अग्रवाल द्वारा मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के आमला में सर्वधर्म शांति यात्रा के दौरान श्रीलंका से बुद्ध की अस्थियां लाए जाने के संबंध में विस्तृत चर्चा किया तो, उन्होंने व्हाट्सएप पर लिखा है,,,, आयुष्मान विजय जी नमो बुद्धाय जय भीम जय प्रबुद्ध भारत,, मैं बुद्ध की शिक्षा धर्म में विश्वास करता हूं। मूर्तियां या अस्थि कलश में और बुद्ध की मूर्तियां तथा अस्थियों के कारोबार में कोई रुचि लगाव नहीं है। अस्थियों का और मूर्तियों का कारोबार व्यापार करने वाले लोग मुझे पसंद नहीं करते।

मैं लोगों को 22 प्रतिज्ञा देखकर बौद्ध बनो,, राज्य सरकार केंद्र सरकार के गजट में बौद्ध घोषित करने का प्रचार प्रसार करता हूं। थाईलैंड के वट साकेत गोल्डन माउंट बैंकॉन्ग मैं भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बुद्ध अस्थि धातु ले गया था। श्रीलंका के कैंडी शहर के दालदा महाविहार में बुद्ध का दांत धातु मौजूद है, अस्थिया नहीं। पटना के पुरातत्व विभाग संग्रहालय से बोधगया में बुद्ध महोत्सव के दौरान 1998 में बुद्ध का अस्थि कलश बड़ी कड़ी सुरक्षा में लाया गया था। बुद्ध के अस्थियों की असलियत को लेकर भारतीयों में बहुत भ्रम का माहौल है।

पुरातत्व विभाग, भारत सरकार के राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली, भारत देश में बुद्ध की अस्थियां अनेक देशों में प्रदर्शित की गई थी। भदंत धम्मविरियो द्वारा सुना गया है, कि वह बहुत बार सरकार द्वारा भेजी गई बुद्ध अस्तियों के साथ विदेश गए हुए थे। मैं गगन मलिक के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। इसका मतलब है, कि श्रीलंका या थाईलैंड से बुद्ध की अस्थियां जो अमला मध्य प्रदेश भारत लाई गई है, वह भ्रमित है। निशा बांगरे के पति मारवाड़ी सुरेश अग्रवाल, गगन मलिक फाउंडेशन द्वारा मध्यप्रदेश के आमला में आयोजित सर्वधर्म शांति यात्रा, श्रीलंका से बुद्ध की अस्थियों का,, आयोजित कार्यक्रम में अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ का जिसे स्वयं निशा बागरे प्रदेश उपाध्यक्ष बताकर इस पद के नाम से बड़े-बड़े पोस्टर आमला में लगाई थी।

वह अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ, संगठन ने, उनके कोई भी प्रदेश स्तर के पदाधिकारियों ने, उस सर्वधर्म शांति यात्रा का समर्थन नहीं किया। ना उस कार्यक्रम में शामिल हुए हैं। यानी कि कार्यक्रम का एक तरह से बहिष्कार ही किया गया, ऐसा माना जा सकता है। जबकि इस कार्यक्रम के पोस्टर बैनर में इस संगठन अजाक्स के प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर जेएन कंसोटिया आईएएस का भी फोटो लगा था। वह भी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए हैं। इस पूरे कार्यक्रम और घटना पर मैंने बहुत कुछ लिखते हुए सच्चाई सामने लाया तो,, दि बुद्धिस्ट सोसायटी आफ इंडिया,, भारतीय बौद्ध महासभा के प्रदेश अध्यक्ष चरणदास ढेगरे ने कहा कि, यह पूरा कार्यक्रम, झूठ पर आधारित है। उन्होंने पहले श्रीलंका से बुद्ध की अस्थियां लाने की बात कही।

बाद में आप के विरोध लेख के बाद थाईलैंड से बुद्ध की अस्थियां लाने की बात बोलकर बौद्ध समाज को गुमराह कर धोखाधड़ी की है। समता सैनिक दल के राष्ट्रीय महासचिव एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के पूर्व कमिश्नर जबलपुर निवासी अशोक शेडे ने कहा है, कि जो मैंने उक्त कार्यक्रम के विरुद्ध लिखा हूं, वह सही लिखा गया है। गगन मलिक फाउंडेशन और निशा बांगरे द्वारा आयोजित कार्यक्रम फर्जी झूठा है। एवं उद्देश्यहिन, बल्कि पूर्ण रूप से राजनीतिक है। किसी भी सूरत में धार्मिक नहीं है। धर्म की आड़ में निशा बांगरे राजनीति कर रही है। वही अनुसूचित जाति जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ छत्तीसगढ़ राजनांदगांव के अध्यक्ष सिद्धार्थ चौरे ने कहा है, की विजय बौद्ध जी पूरे घटनाक्रम पर आपने समाज को आईना दिखाया है।

आपकी लेखनी में बेबाक रूपी धार स्पष्ट परिलक्षित होती है। आपको बहुत-बहुत साधुवाद धन्यवाद,,, जिला दुर्ग छत्तीसगढ़ की महिला नेत्री बुद्धिजीवी सविता बौद्ध ने कहा है, कि विजय बौद्ध जी,,, निशा बांगरे का डिप्टी कलेक्टर से इस्तीफा राजनीतिक है। बीजेपी और कांग्रेस के लिए काम करने वाले दलालों से समाज सावधान रहें। यह समाज का शोषण करते हैं, संरक्षण एवं संवर्धन नहीं,, यह बात हमें समझने की आवश्यकता है। चमचों और दलालों के झूठ की पोल एक न एक दिन जरूर खुलती है। और समाज में ऐसे चमचों दलालों राजनीतिक गुलामों की कमी नहीं है। जो अपने घर में आग लगाकर दुश्मन के घर में पनाह लेते है, और फिर खदेड़ दिए जाते हैं।

बौद्ध समाज जन कल्याण शिक्षा समिति भोपाल की अध्यक्ष ज्योति धाबाडे ने कहा है, कि विजय बौद्ध जी आपने,, निशा बांगरे के कार्यक्रम पर जो लिखा है, वह बिल्कुल सही लिखा है। भारतीय बौद्ध महासभा के प्रदेश स्तरीय पदाधिकारी बीसी सहारे भोपाल ने कहा है, कि विजय बौद्ध जी, आपने समाज को सही जानकारी दि, उसके लिए आपको साधुवाद,, भोपाल के बुद्धिजीवी जगदीश गजभिए ने कहा है, कि गगन मलिक फाउंडेशन, निशा बांगरे, और उसके पति मारवाड़ी बनिया हिंदू सुरेश अग्रवाल द्वारा सर्वधर्म सम्मेलन आयोजित करना समाज को बेवकूफ बनाने का काम है। यह काम भोपाल की बुद्ध भूमि के शाक्य पुत्र सागर बौद्ध भिक्षु भी कर रहे हैं। आगरा उत्तर प्रदेश के आर आर गौतम सेवानिवृत्त कुलसचिव ने निशा बांगरे के नाम संदेश लिखकर भेजा है,

आप कैसी अंबेडकरवादी है ॽ आपने मात्र ग्रह प्रवेश और पूजा पाठ में शामिल नहीं होने के लिए अनुमति नहीं मिलने पर डिप्टी कलेक्टर के पद से इस्तीफा दे दी है ॽ क्या आपने डॉक्टर अंबेडकर का जीवन संघर्ष नहीं पढ़ाॽ कितनी कुर्बानियों के बाद भी डॉक्टर अंबेडकर ने अपने लक्ष्य से नहीं हटे डटे रहे। एक बुद्धिजीवी ने लिखा है, अनुसूचित जाति की एक महिला डिप्टी कलेक्टर ने अपने घर के उद्घाटन में सर्व धर्म, पूजा पाठ के लिए शासन द्वारा छुट्टी नहीं मिलने के कारण इस्तीफा दे दिया। जरा सोचिएॽ अगर डॉक्टर अंबेडकर भी अगर धर्म और पूजा पाठ के चक्कर में पड़ जाते तो आज हमारा क्या होता ॽ इस निशा बांगरे महिला से पूछा जाना चाहिए, कि यह अधिकारी पूजा-पाठ ग्रह प्रवेश और सर्वधर्म शांति यात्रा आयोजित करने के लिए बनी थीॽ या अपने समाज का शासन प्रशासन में प्रतिनिधित्व करने के लिए ॽ

एक बुद्धिजीवी अशोक अज्ञानी ने लिखा है, यह दलित महिला अधिकारी केवल इस बात से हताश हो गई, कि इसे मध्य प्रदेश सरकार ने पूजा पाठ करने के लिए छुट्टी नहीं दी,, यदि पूजा-पाठ के चक्कर में डॉक्टर अंबेडकर भी आहत होते, तो सोचिए,, हमारे समाज का क्या होता ॽ उन्होंने फिर लिखा है, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत दीना भाना ने डॉक्टर अंबेडकर का जन्म दिवस मनाने के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर नौकरी से इस्तीफा दिया था। लेकिन इस मैडम निशा बांगरे ने पूजा-पाठ ग्रह प्रवेश के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर डिप्टी कलेक्टर के पद से इस्तीफा दे दी। और बड़े ही गर्व के साथ कहा है, कि यह बहुत छोटा पद है। तो मैं बताना चाहता हूं, मैडम जी,,, यदि डॉक्टर अंबेडकर का रहमो करम नहीं होता तो आप चपरासी भी नहीं बनती।

कहीं गटर नाली साफ करती फिरती रहती। जिस डॉक्टर अंबेडकर ने तुम्हें इस काबिल बनाया उनके मिशन आंदोलन कारवा को आगे बढ़ाने के बजाय श्रीलंका से फर्जी नकली बुद्ध की अस्थियों का सहारा लेकर सर्वधर्म शांति यात्रा निकालकर, हिंदू धर्म के साधु-संतों के साथ पूजा पाठ कर समाज को गुमराह कर उनके साथ गद्दारी बेईमानी धोखाधड़ी ही कर रही होॽ भगवान बुद्ध की अस्थियां भारत के आर्कोलॉजी पुरातत्व विभाग में मौजूद है। कुछ देशों में भी मौजूद है। परंतु गगन मलिक जैसे मूर्तियों के तस्कर व्यापारी यह भगवान बुद्ध की अस्थियां कहां से लाते हैंॽ कैसे लाते हैंॽ और श्रीलंका थाईलैंड सरकार इस गगन मलिक को अस्थियां कैसे सौंप देती हैॽ यह विचारणीय प्रश्न हैॽ

यह भारत सरकार का कोई प्रतिनिधि हैॽ 5 वर्ष पूर्व भी चंद्रबोधी पाटिल गेंग के साथ इसी गगन मलिक एवं कई तथाकथित बुद्धिस्टो ने श्रीलंका से भगवान बुद्ध का अस्थि कलश लाकर भाजपा शासित राज्य महाराष्ट्र मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ही बौद्ध समाज के सामने प्रदर्शन किया था। उन्हें दर्शन करवा कर लाखों करोड़ों रुपए लूट वसूल किया था। इनके खिलाफ मैं और मेरे एक साथी विश्व बौद्ध संघ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जबलपुर में एक जनहित याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट ने जवाब मांगा था,तो इन्होंने महीनों जवाब नहीं दिया था। और इनकी हार्टअटैक जैसी स्थिति हो गई थी। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के आग्रह पर इन्हें भारत सरकार, भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने बचा लिया था। हाईकोर्ट ने इन्हें ऐसी गलती फिर से ना करें, इस बात को लेकर इन्हें माफ किया था। इन्होंने जो पिछली बार श्रीलंका से बुद्ध की अस्थियां लाई थी।

और वहां के आर्कोलॉजी विभाग श्रीलंका का पत्र लाए थे। उसमें उल्लेख था, कि खुदाई के दौरान कुछ अस्थियां निकली है, हो सकती है यह भगवान बुद्ध की अस्थियां होगीॽ स्पष्ट लिखा नहीं था, कि यह भगवान बुद्ध की अस्थियां ही है। गगन मलिक फाउंडेशन और उनके सहयोगी चंदू पाटिल ने भगवान बुद्ध की अस्थियों के नाम पर न जाने किस बीजेपी नेता के मां की अस्थियों का बौद्ध समाज को दर्शन करवा दिया था। इनके द्वारा उसमें लाई गई तथाकथित बुद्ध की अस्थियों का नागपुर दीक्षाभूमि ट्रस्ट ने कड़ा विरोध किया था। और दीक्षाभूमि में प्रवेश नहीं करने दिया था।

यह बुद्ध की अस्थियां भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी के नेतृत्व में नागपुर में प्रदर्शन किया गया था। कई वर्षों पुरानी बात है, ऐसा ही नागपुर में हुआ था, डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर की अस्थियों पर हवाई जहाज से फूलों की वर्षा की गई थी। बाद में यह पता लगा था, कि वह किसी नेता की मां की अस्थियां है। अब यह शोध का विषय है। हम लोग गंभीरता से जांच पड़ताल कर वस्तुस्थिति समाज के सामने लाएंगे और पुनः हाईकोर्ट में जाने की जरूरत पड़ी तो हाईकोर्ट जाएंगे। फिर भी मैंने कई तरह से जांच पड़ताल करके वस्तुस्थिति को सामने लाने का पूरा प्रयास किया हूं। मेरे पास भारत सरकार के पुरातत्व विभाग का पत्र है।

उन्होंने स्पष्ट लिखा है। कि 1994 अप्रैल में भारत सरकार से श्रीलंका में बुद्ध की अस्थियां ले जाई गई थी, और जुलाई 1994 में वापस भारत लाई गई है। बोधगया मे कई बौद्ध विद्वान बौद्ध भिक्षु है जिनसे मेरी व्यक्तिगत पहचान है, उन्होंने भी मुझे फोन करके बताया था, कि श्रीलंका में भगवान बुद्ध की अस्थियां नहीं है।

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