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शान्ति और मैत्री सन्धि । भारत और नेपाल के बीच क्या शान्ति एवं सौहार्द स्थापित होंगे ?

शान्ति और मैत्री सन्धि । भारत और नेपाल के बीच क्या शान्ति एवं सौहार्द स्थापित होंगे ?

प्रदीप कुमार नायक। स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार

भारत और नेपाल के बीच सुगौली सन्धि अंतराष्ट्रीय मानचित्र पर पहचाना जाता है!दरअसल सुगौली सन्धि ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के तत्कालीन राजा के बीच हुई एक सन्धि है!नेपाल की ओर से इस पर राजगुरु गजराज मिश्र एवं सहायक चंद्र शेखर उपाध्यक्ष और कंपनी की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल पेरिस ब्रेडशो ने हस्ताक्षर किए थे! सन्धि के तहत नेपाल ने अपने भू -भाग का लगभग एक तिहाई हिस्सा गवां दिया, जिससे नेपाल के राजा द्वारा पिछले 25 साल में जीते गए क्षेत्र जैसे की पूर्व में सिक्किम पश्चिम में कुमाऊ और गढ़वाल राजशाही और दक्षिण में तराई को अधिकतर क्षेत्र शामिल था!तराई भूमि के कुछ हिस्सा 1816 में ही नेपाल को लौटा दिया गया!1860 में तराई भूमि का एक बड़ा हिस्सा नेपाल को 1857 के भारतीय विद्रोह को दबाने में ब्रिटिश की सहयता करने की एवज में पुन:लौटाया गया।

दिसंबर 1923 में सुगौली सन्धि को अधिक्रमित कर सतत शान्ति और मैत्री सन्धि में प्रोन्नत किया गया और ब्रिटिश निवासी के दर्जे को प्रतिनिधि से बढाकर दूत का कर दिया गया!1950 में स्वतंत्र भारत और नेपाल ने एक नई सन्धि पर दो स्वतंत्र देशों के रूप में हस्ताक्षर किए। जिसका मकसद था दोनों देशो के बीच संबंधों को एक नए सिरे से स्थापित करना।

नेपाल में चीन का बढ़ता हस्तक्षेप और भारत- चीन सीमा पर संकट को लेकर समस्त भारत वासी चिंतित हैं।भारत के सुरक्षा के सवाल पर भारत-नेपाल मामले के जानकार और विश्लेषक,स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रदीप कुमार नायक लिखते हैं कि वक़्त अब चुप बैठने का नहीं,बल्कि चुप्पी तोड़ने का हैं।आज भारत की बढ़ती शक्ति एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती हैं।आइये पढ़ते हैं,उन्हीं की कलम से लिखे गए एक मार्मिक और अनसुलझी हुई आर्टिकल। भारत और नेपाल सदियों से मित्रवत रहे हैं। दोनों देशों के नागरिक आपस में कुटुम्ब की तरह रहते हैं।नेपाल में भारत की भागीदारी ” वसुधैव कुटुम्बकम ” के सिद्धान्त और पड़ोसी पहले की नीति पर आधारित हैं। उन्हें ऐसा कभी एहसास नहीं हुआ कि वे अलग-अलग देश के वासी हैं।

नेपाल पर जब कभी विपदा आयी तो भारत सहायता के लिए सबसे पहले पहुँचा। नेपाल को यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि जो देश कभी “चीनी हिन्दी भाई भाई “का नारा लगाता था, उसे तो उसने धोखा देने से बाज नही आया।वह नेपाल के साथ क्या करेगा ? नेपाल के साथ क्या होगा ? क्या नहीं यह उसका मसला हैं। खतरा यह गहरा रहा हैं कि नेपाल को मोहरा बनाकर भारत के खिलाफ चीन किसी भी हद तक जा सकता हैं।हालांकि ऊपरी तौर पर वह भारत का हितचिंतक होने का नाटक भी करता हैं।नेपाल को यह भी याद रखने की जरूरत है कि चीन ने 1954 के वांडुंग सम्मेलन के मसौदे की धज्जी 1962 में भारत पर अकारण हमला कर उड़ाई थी।वैसा करते उसने विश्व जनमत का भी ख्याल नही रखा था।

विश्लेषकों की मानें तो नेपाल की सत्ता पर कट्टर कम्युनिस्टों के काबिज होने के बाद चीन की रणनीति विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के तमाम संबैधानिक एवं महत्वपूर्ण पदों पर समर्पित कम्युनिस्टों को बैठाकर निरंकुश शासन कायम करना हैं। कम्युनिस्ट नेतागण उसकी इस मंशा को फलीभूत करते नजर आ रहे हैं।यह भारत की सुरक्षा के ख्याल से बेहद चिंतनीय हैं।भारत सदियों पुराने सामाजिक व सांस्कृतिक रिश्तों की ही दुहाई देता रहेगा, तो आनेवाले दिनों में उसे इस मोर्चे पर भी कश्मीर जैसे खतरनाक हालात से जूझना पड़ सकता हैं।

खतरा इसलिए भी बड़ा हैं कि दोनों देशों की लम्बी सीमाएं खुली हुई हैं।अबाध आवागमन की व्यवस्था है।हालात की गभीरता के मद्देनजर भारत को थोड़ी कठोरता दिखानी होगी।आँख दिखाने वाले का उसकी औकात बतानी होगी।वक़्त की यही जरूरत है।भारत को नेपाल के प्रति दूरदर्शिता पूर्ण नजरिया अपनाना होगा।अन्यथा वहां जिस तरह से चीन का प्रभाव बढ़ रहा हैं,उससे भारत का सुकून में जीना रहना मुहाल हो जा सकता हैं।

नेपाल के नये संविधान में मधेसियों के साथ भेदभाव किया गया है।अधिकतम मधेसी भारतीय मूल के हैं।नये संविधान में मधेसियों को कोई विशेष स्थान नही देकर संविधान निर्माताओं ने लोकतंत्र की लड़ाई में उनकी कुर्बानी पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया।भारत समर्थक मधेसी अपने इस अपमान को भुला नही पाते हैं।नेपाल में मधेसियों के साथ दोहरी नीति रखी जाती हैं।नेपाल में मधेसियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता हैं।

इसलिए कभी-कभी मधेसी नेपाल में अपनी हक-अधिकार की आवाज को बुलन्द करते हैं। भारत और नेपाल के बीच 31 जुलाई 1950 मे हुई “शान्ति और मैत्री संधि” को लेकर भी नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार सख्त हैं। इस संधि के खिलाफ नेपाल सरकार अपनी भाषण देते रहते हैं।उनके मुताबिक यह संधि नेपाल के हित में नहीं है।इससे यह देश कभी अपने पैरों पर खड़ा नही हो सकता।इसी समझ के तहत वह इस संधि को खत्म करना चाहते है।दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी एक बड़ा मुद्दा हैं।

सुस्ता, कालापानी, लिप्पुलेख और लिपियाधुरा को लेकर भी काफी विवाद हैं।पूर्व में इस मुद्दे पर विदेश सचिव स्तर की बैठक पर सहमति बनी थी लेकिन इसे मूर्त रूप नहीं मिल सका।

पुष्प कमल दाहाल”प्रचंड”के नेपाल का नया प्रधानमंत्री बनने के बाद पड़ोसी देशों से उसके रिश्ते को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।प्रचंड को आम तौर पर चीन की ओर झुका माना जाता हैं।प्रचंड पहले ही कह चुके है कि नेपाल में बदले हुए परिदृश्य के आधार पर भारत के साथ नई समझ विकसित करने की आवश्यकता है।उन्होंने कहाँ था कि 1950 की मैत्री संधि में संशोधन और कालापानी व सुस्ता सीमा विवादों को हल करने जैसी सभी बकाया मुद्दों के समाधान के बाद यह तय होगा।भारत और नेपाल के बीच 1950 की शांति और मित्रता संधि दोनों देशों के बीच विशेष संबंधों के आधार पर बनाती हैं।

हालांकि,प्रचंड ने हाल के वर्षों में कहां था कि भारत और नेपाल को द्विपक्षीय सहयोग की पूरी क्षमता का दोहन करने के लिए इतिहास में छूटे कुछ मुद्दों का कूटनीतिक रूपसे समाधान किए जाने की जरूरत हैं।

वर्तमान परिवेश में सभी लोग शान्ति से जीना चाहते हैं। सुखी रहना चाहते हैं।देश छोटा हो या बड़ा हो हर देश का नागरिक यह सुनना चाहेगा कि कोई उसके देश का बुराई नहीं करे।आम नागरिक दुश्मनी पैदा नही करता हैं।यह दुश्मनी सरकार, नेता और मीडिया वाले पैदा करते हैं।नेपाल हमारा कभी भी दुश्मन नहीं था ना हैं।नेपाल के लोग भारत में काम करने आते हैं और भारत के लोग भी नेपाल में जाते हैं।नेपाल ने कभी भी भारत का अहित नहीं सोचा हैं लेकिन भारत की तरह अब नेपाल के भी नेतागण भ्रष्टाचारी होते जा रहे हैं। प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल “प्रचंड” ने पोखरा में चीनी सहायता से निर्मित क्षेत्रीय अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे का उदघाटन नए साल पर किया।यह नेपाल-चीन बेल्ट एण्ड रोड़ पहल की प्रमुख परियोजना हैं।जिसका निर्माण चीनी रृन सहायता से किया गया हैं।

सवालों में उलझते नेपाल को जवाब चाहिए।मगर देगा कौन ? यह एक यक्ष प्रश्न हैं।कटघरे में नेपाल सरकार भी हैं।पक्ष तो विपक्ष भी।पुलिस की वर्दी से लेकर काले लिबास में न्याय देने वाले फरिश्ते भी।राजनेताओं के वेश में देश द्रोही कहे जाने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्य भी। मगर,नेपाल वहीं है जहाँ उसे न्याय देने,सुनने,समझने वाला कोई नहीं।नेपाल ही नहीं यहाँ के अधिसंख्यक लोंगो की भावनाओं पर मरहम भले लगा हो लेकिन, जवाब देने-सुनने की जल्दी में हर तरफ लोकतंत्र की साख खतरे में दिख रही हैं।ऐसे में लोकतंत्र की हत्या करने से लेकर एक दूसरे के सहयोग से सरकार बनाने व नेपाली जनता की सेवा करने वालों की फौज कम होने को कतई तैयार नहीं।संतुष्टि की बात एकदम बेमानी,कही दिखती तो सवाल कुछ और होता,लेकिन ऐसा नहीं हो रहा हैं।आखिर नेपाल के अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन, अक्षमता व कुप्रशासन का जिम्मेदार कौन हैं।

जिम्मेदारी की बात तो नेपाल के एक आम नागरिक भी सरकार से पूछ रही हैं।मगर,नेपाल सरकार तो मौन हैं।

मेरा मानना हैं कि सन, 1950 की भारत-नेपाल की शांति और मैत्री संधि को लेकर बहस करने के अलावा बदलते परिवेश में इसे पुनरावलोकन व संशोधन करना दोनों देश के हित में होगा।दूसरी ओर भारत को अपने रक्षा और सामरिक संबंधों का विस्तार करना होगा।

लेखक – स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनलो में अपनी योगदान दे रहे हैं। मोबाइल – 8051650610

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