कबीर मिशन समाचार। पत्रकारिता वह जज्बा हैं, जिससे समाज व देश की बड़ी सेवा होती हैं।वगैर किसी इमदाद व सुरक्षा के पत्रकार जो काम करते हैं, उसकी तारीफ जितनी भी की जाय वह कम होगी।आज जरूरत हैं, इसी तरह के जुनून व माद्दा रखने वाले इस फील्ड में आये और देश के चौथा स्तम्भ को और भी सशक्त बनायें। पिछले पैतीस वर्षों से अधिक समय से स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े प्रदीप कुमार नायक द्वारा सैकड़ो हिन्दी, मैथिली और नेपाली पत्र-पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों के अलावे चैनलों में प्रकाशित सरकार, समाज, पत्रकार, नेताओं के उल्लेखनीय कतिपय कमियों को उजागर करने वाले तथा अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, शोषक, कुप्रथा, अंधविश्वास, धर्म के नाम पर शोषण करने वाले आर्टिकल तथा रपटों पर हमें लोगों द्वारा अनेक प्रतिक्रियाएं मिली हैं।

अधिकांश लोगों ने हमारे प्रयास को सराहा हैं, पर इनमें से कुछ लोगों के प्रतिक्रिया व बातचीत का अवलोकन करने से प्रतीत होता हैं कि हमारे बेबाक लेखन के इस प्रयास को वे विरोधी मुहिम समझने लगे हैं।

ऐसे लोगों को यह बताना उचित समझता हूं कि मैं पत्र-पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों तथा चैनलों के माध्यम से सच लिखने की अपनी वचन बद्धता पर कायम हूं।शायद इसलिए कि अन्याय,अत्याचार, भ्रष्टाचार तथा सरकार की उल्लेखनीय खामियों को भी नजरअंदाज करने का मन बना चुके कुछ लोग हमारे बारे में ऐसी धारणा बना बैठे हैं।मैं ऐसे लोगों को पूरी इज्जत के साथ यह कहना चाहूंगा कि वे जैसा समझ रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं हैं।हमने प्रत्येक आर्टिकल तथा समाचार में यथार्थ से जन सामान्य को अवगत कराने के अपने दायित्व का निर्वहन किया हैं। इतना ही नहीं पत्रकारिता में न्याय पालक की कमियों को उजागर करने का दुःसाहस भी कम ही लोगों ने किया होगा।

यह कोई जरूरी नहीं कि हमारी निष्पक्ष बेबाक और निर्भीक पत्रकारिता से सभी पक्ष संतुष्ट रहे,पर पत्रकारिता के आदर्श का पालन करके ही प्रजातन्त्र में जनता का हित साधा जा सकता हैं।इस तथ्य पर विश्वास रखकर हम आगे भी बेबाक पत्रकारिता करते रहेंगे। सच तो यह हैं कि हमनें अपनी लेखनी में कई बार दुहराया हैं कि कुछ लोग बेहतर काम कर रहे हैं।हमने अपने लेख में प्रजातंत्र के चारों घटकों विधायिका,न्यायपालिका, कार्यपालिका और पत्रकारिता में से प्रत्येक की व्यवस्थागत कमियों को बेबाकी से उजागर किया हैं।जिन लोगों ने मेरा लेख,रचना एवं समाचार लगातार पढ़ा होगा वे इस बात की गवाही देने की स्थिति में होंगे कि हमने विपक्षी राजनेताओं के बारे मे भी चुभने वाली सच्ची खबरों के साथ-साथ बड़े मीडिया हाउसों से संबंधित स्याह सच्चाइयों को भी उसी बेबाकी से प्रकाशित कराया हैं।

हमारा लेख “मधुबनी सरकारी अस्पताल को स्वयं इलाज की जरूरत”,”मिले गोस्त चबाने वाले”,”आखिर राजनगर को पर्यटन स्थल का दर्जा कब?”,”सिंथेटिक मिठाई या मीठा जहर”,”समाज के लिए अभिशाप हैं मृत्यु भोज”,”प्रजातंत्र या लूटतंत्र भ्रष्ट नेताओं पर नियंत्रण क्यों नहीं?”,शुद्ध दूध का संकट दूध की जगह जहर पी रहे हैं लोग”,”हर खाने में जहर फिर भी शासन प्रशासन मौन क्यों?”,”हाल ए राजनगर नाट्य परिषद के विश्वसनीयता पर संदेह क्यों?”,”बेखौफ अपराधी और अबैध शराब कारोबारी”,”स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार को भ्रष्टाचारियों की नसीयत”,”पत्रकार पर हमला आखिर कब तक?”,”भारत और नेपाल संधि पर सवाल”,मृत्यु भोज एक वीभत्स कुरुति,होना चाहिए सामाजिक बहिष्कार”,”मिलावटी मिठाइयों का कारोबार शुरू”,”जाने कहाँ गए आज़ादी के वो दिन”,”नकेल कसने में खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण विभाग लाचार क्यों?,”सवाल देश की जनता का ऐसे हजारों में से प्रत्येक आवरण लेख में हमने यथार्थ से जन सामान्य को अवगत कराने के अपने दायित्व का निर्वहन किया हैं।

अक्षरों को शब्द, शब्दों को वाक्य और वाक्यों को लालित्य प्रदान करने वाले एम.काँम. प्रथम श्रेणी से उतीर्ण स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, प्रदीप कुमार नायक पत्रकारिता के क्षेत्र में लोगों को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।जी हाँ, वर्तमान समय में दर्जनों पत्र-पत्रिका, समाचार पत्र एवं चैनलों में अपनी लेख,रचना और समाचार लिख रहे हैं।उनकी ज्वलंत मुद्दे अन्याय,अत्याचार, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, शोषण पर लिखे गए लेख तथा रचना काफी पसंद किए जाते हैं। अपनी कलम की ताकत से समाज व देश से जातपात, छुआछूत, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, अंध-विश्वास जैसी समस्याओं और कुरीतियों को जड़ से खत्म करने तथा मिटाने का इरादा रखने वाले स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, प्रदीप कुमार नायक अपनी लेखन के माध्यम से समाज में चेतना,जागृति तथा जागरूकता फैलाने के साथ-साथ समाज को नई रोशनी देने का कार्य करते हैं।

वे पत्रकारिता संगठन के अलावा हिन्दी दिवस के अवसर पर काव्य कला निखार मंच,उत्तर प्रदेश द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान-2020 में सम्मनित भी हो चुके हैं।बेहतर लेख,रचना एवं पत्रकारिता के लिए भारत के प्रतिष्ठित अखबार नव भारत टाइम्स ने वर्ष 1987 में इन्हें प्रमाण पत्र देकर सम्मनित भी किया।

भारतीय लोकतंत्र की यह सबसे बड़ी विडंबना रही हैं कि आम जनता के ऊपर गुलाम भारत में भी साम,दाम, दंड,विभेद की नीति पर शासन करते रहने वाले राजे- महाराजे के वंशज ही सबसे पहले लोकतंत्र के रहनुमा बनने की नौटंकी करने लगे।इनके अलावा भारी औधोगिक,कारपोरेट घराने के लोग भी अपने व्यवसायिक हित में राजनीति की गलियों के बादशाह बनने लगे।इन दोनों वर्गों की निजी सेना के रूप में चुनावी जंग में गंभीर व खतरनाक भूमिका का निर्वहन करने वाले दुर्दान्त आपराधिक सरगना भी नेता बनने लगे।जिसके कारण लोकतंत्र, राजतंत्र, अपराध तंत्र एवं भ्रष्टतंत्र का पर्याय मात्र बनकर रह गया।

लेखक – स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्र एवं चैनलो में अपनी योगदान दे रहे हैं। मोबाइल – 8051650610