25 वें शहीद किसान सम्मेलन में पहुंचे राकेश टिकैत, कहा देश का किसान दुखी है, करेगें बड़ा आंदोलन

सतीश भारतीय

किसान संघर्ष समिति द्वारा 12 जनवरी को 25वां शहीद किसान स्मृति सम्मेलन एवं 301वीं किसान महापंचायत बैतूल जिले के मुलताई में आयोजित की गयी।
इस शहीद स्मृति सम्मेलन में संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत भी शरीक़ हुए। इस दौरान शहीद किसानों को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। शहीद किसानों की 25 वीं बरसी के अवसर पर बोलते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि, “मध्यप्रदेश सरकार द्वारा आज तक शहीद किसानों के लिए 1 इंच भी जमीन आवंटित नहीं किया जाना सरकारों की किसान विरोधी नीतियों को दर्शाता है।” आगे वह कहते हैं, “कांग्रेस और भाजपा पार्टी के द्वारा शहीदों को आजतक श्रद्धांजलि नहीं दी गई। उन्होंने दोनों पार्टियों के नेताओं और सरकार से पूछा कि वे कौन थे जिन्हें पुलिस ने 12 जनवरी 1998 को गोली मारी थी?”

फिर, राकेश टिकैत ने कहा:
“सरकारें किसानों की जमीनें छीनकर उन्हें कॉर्पोरेट को सौंपने की साजिश कर रही हैं। उन्होंने देश के किसानों से कृषि भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ निर्णायक संघर्ष छेड़ने की अपील की। टिकैत ने डॉ सुनीलम सहित 3 किसानों की सजा रद्द करने की मांग भी की।”

उन्होंने किसानों से यह भी कहा कि “वे घर में जन्मदिन पेड़ लगाकर मनाएं। इससे पर्यावरण भी बचेगा और याद भी बनी रहेगी।”

किसान नेता टिकैत यह बोलते हैं कि, “हर समस्या का हल संघर्ष में निहित है। यदि संघर्ष नहीं किया तो किसान ,किसानी और गांव कुछ भी नहीं बचेगा।” राकेश टिकैत ने इसके अलावा भी अन्य पहलुओं पर बात की।

इस शहीद किसान स्मृति सम्मेलन में शामिल हुए, मध्यप्रदेश किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष डॉ सुनीलम से किसानों की शहादत और स्मृति सम्मेलन को लेकर द मूकनायक ने बातचीत की।

तब डॉ सुनीलम कहते हैं:

“हर वर्ष शहीद किसान स्मृति सम्मेलन उन 24 किसानों की स्मृति में आयोजित किया जाता है, जो 12 जनवरी 1998 को जो पुलिस गोली चालन में शहीद हुए थे। देश भर के जन संगठन इन शहीदों को श्रंद्धाजलि अर्पित करते आए। ऐसे में इस बार किसान नेता राकेश टिकैत यहाँ आये हुए हैं।”

आगे वह कहते हैं: “…हम मुल्तापी घोषणा पत्र भी जारी करेगें जिसमें किसानों को लेकर 59 सूत्रीय मागें रहेगी। इन मांगों में एम एसपी का मुद्दा है, किसानों की कर्जमाफी का मुद्दा हैहै, किसान पेंसन योजना है, जैसी अन्य मांगे हैं।”

फिर उन्होंने, किसानों की समस्याओं का उदाहरण देते हुए, पेंच परियोजना के संदर्भ में कहा: “पेंच में 31 गांव ढूब क्षेत्र में आये हैं। इन गांव को विस्थापित (जिनमें ज्यादातर आदिवासी और दलित किसान भी है) भी किया गया। लेकिन उचित मुआबजा, सुविधाएं नहीं दी गयी। जिसको लेकिन हमारा सुप्रीम कोर्ट में केस भी चल रहा है।”

आगे मूकनायक ने, इस आयोजन में मौजूद, किसान संघर्ष समिति की प्रदेश उपाध्यक्ष और एडवोकेट आराधना भार्गव से, किसानों की शहादत और स्मृति सभा पर उनका क्या नजरिया? यह जानना चाहा।

तब आराधना भार्गव बताती हैं कि,

“1997 में किसान की फसलें खराब हुयी, तो 12 जनवरी 1998 को जो किसान ने अपना मुआब्ज़ा मागने एकत्रित हुए। वहां उन पर पुलिस द्वारा गोलियां चलाई गयीं। और 25 किसान शहीद हो गये। 150 किसान घायल हुए। और 250 किसानों पर फर्जी मुकदमें लादे गये।”

वह आगे कहतीं हैं: “…..लोकतंत्र में पुलिस से प्रशासन नहीं चलता। ये जनकल्याणकारी राज्य है। और जनता की आवाज़ को सुनना चाहिए, जो काम अंग्रेजों ने किया वही काम हमारी चुनी हुई सरकारों ने किया।…. आज जो हमारे किसान फसल बीमा का लाभ ले रहें हैं, ये किसानों की शहादत से पहले सरकार कर देती, तो हमारे 25 किसान शहीद नहीं होते।”

आगे उनका कहना रहा कि, “उसके (25 किसानों की कुर्बानी) के बाद, लगातार हम ये देख रहे हैं कि, 97 हजार लोग पुलिस गोली चालन से मारे गये हैं। ….एक संदेश तो हम ये देते हैं कि , ये जो शासन है, वह जनकल्याणकारी शासन है, पुलिस शासन नहीं है, और 1861 का जो पुलिस शासन है, वो भारतीयों पर दमन के लिए बनाया गया था। उसमें संशोधन होना चाहिए।”

इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा कि, “किसानो की शहादत के स्मृति के इस अवसर पर हमारे ढूब प्रभावित क्षेत्रों से (आदिवासी, दलित अन्य) किसान आये हैं, जिन्हें 2016 में विस्थापित किया गया। और पुनर्वास नीति 2013 के तहत सुविधाएं मिलनी थी, लेकिन पुनर्वास नीति 2002 तहत सुविधाएं देने की बात कही गयी। तब 2002 के तहत ही पूरी नहीं मिली, उन्हें समस्त सुविधाएं तो दो। अगर, आप किसानों की जमीने लेगें और उन्हें सम्मानजनक रोजगार और निवास दिलायेगें, तब देश में समस्त लोग विकास के लिए अपनी जमीनें देगें। लेकिन पूरे वातावरण ऐसा है कि, दूध की मक्खी की तरह निकालकर हमारे किसानों को फेंका जा रहा है, ऐसे में हम लोग उसके खिलाफ मजबूती से आवाज़ उठाने का काम कर रहे हैं।”

इस शहीद किसान स्मृति सम्मेलन में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्रता सेनानी, किसान नेता, सामाजिक संगठन, हजारों आदिवासी, दलित सहित अन्य किसानों ने अपनी एकता की दृढ़ता दिखायी।