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अम्बेडकरवादी संघटनों के खोखले विचार कर रहे हैं समाज को भटकाने का काम- part 1

अम्बेडकरवादी संघटनों के खोखले विचार कर रहे हैं समाज को भटकाने का काम- part 1

लेख। आपको हेडलाइन में पढ़ने पर जरूर मैं विरोधी लग सकता हूं लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि आप सभी जानते हैं कि वास्तव में कहीं न कहीं ये बात सत्य है। आप खुद मेरे लिखे शब्दों से जाने कि कैसे संगठन व पार्टी बनती है और फिर सब धुंधला सा हो जाता है।

हजारों सालों का इतिहास है। जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ने कई यातनाएं सहनी पड़ी है। समय समय पर समाज में कई उद्धारक पैदा हुए हैं और समाज के लिए काम करते हुए अपना पुरा जीवन लगा दिया है। जिनको अब हम डिजिटल जमाने में जानने लगे हैं। क्योंकि इससे पहले शायद ही इतना सामाजिक परिवर्तन हुआ होगा। इसमें सबसे पहले गौतम बुद्ध का नाम आता है। साथ ही अनेक संत कबीर साहब, संत रविदास, संत गाडगे, बिरसा मुंडा, रामास्वामी पेरियार आदि रहे हैं। महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई फुले ने जो क्रांति लाई है वो अब कोई नहीं ला पाए हैं। आज सबसे बड़ा नाम पुरे विश्व में बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर जी लिया जाता है और यही वहां नाम है जिनके कारण हजारों सालों की बेड़ियों को तोड़ा गया है। बाबा साहब अम्बेडकर के बारे में आप सभी भलीभांति परिचित हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो करना था कर दिया।

हम बात कर रहे हैं बहुजन वर्ग के संगठन और पार्टी की

भारत की आज़ादी के बाद से देश में लोकतंत्र की राजनीति की शुरुआत हुई। पुरे देश में एकछत्र कांग्रेस का राज रहा है। इसी के बीच बाबा साहब अम्बेडकर ने भी राजनीतिक पार्टी बनाई थी। लेकिन अपनी लेबर पार्टी को भी इतनी ताकत से खड़ी नहीं कर पाएं। इसके बाद रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया को खड़ा किया जो महाराष्ट्र में सिमट कर रह गई और बाद में टुकड़े टुकड़े हो गई। खैर उनके जाने के बाद भी दशकों से अम्बेडकर नाम पर धुल जमा हो गए। इसके बाद इतिहास में एक घटना घटित होती है और कांशीराम साहब का नाम आता है। उन्होंने अपना पुरा जीवन बहुजन समाज को एकजुट करने में लगा दिया। मान्यवर कांशीराम साहब ने कई सालों तक बाबा साहब की बनाई पार्टी में काम किया लेकिन उन्होंने भी वही महसूस किया जो आज बाबा साहब अम्बेडकर का सच्चा अनुयायी कर रहा है।

वे वहां से निकलकर उत्तरप्रदेश में समाज के बीच काम किया। बामसेफ और डीएस 4 नाम के संगठन बनाए। मान्यवर कांशीराम साहब के निरंतर पार्दर्शिता और जुनुनी काम ने देखकर दबे कुचलें लोगों में प्राण डालने का काम किया है। उन्होंने कहा था कि जब तक सामाजिक जड़ें मजबूत नहीं होगी हम राजनीति में कभी सफल नहीं होंगे। उन्होंने सामाजिक जड़ें मजबूत कर एक राजनैतिक पार्टी बहुजन समाज पार्टी को खड़ा किया और देश में एससी एसटी, अल्पसंख्यक और ओबीसी वर्ग को एकजुट करने में सफल हो गए। इससे विरोधीयों को पसीने छूट गए। देश के सबसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री बना दिया और वहां भी एक महिला को उस दौर में जब महिला घुंघट से भी बहार नहीं आई थी। इसके साथ ही कांशीराम साहब के विचारों से प्रभावित होकर अनेक खुरापाती लोगों ने भी अपने अपने राज्य में दल बनना शुरू कर दिया था और पहले से हो रहे जाति के टुकड़े टुकड़े को फिर से छोटे छोटे दलों में सिमटने लग गए।

हम बहुजन समाज पार्टी की बात इसलिए कर रहे हैं कि पुरे देश में दबे कुचलें लोगों की हुक्मरानों में यही एक मात्र ताकत सामने आई थी। इसके चर्चे देश विदेश में भी होने लगें थें। बहुजन समाज पार्टी का दलित आदिवासी और पिछड़े वर्ग पर गहरा प्रभाव पड़ा और समाज एक चुम्बक की तरह जुड़ने लगे थे।

तोड़ जोड़ कि राजनीति और कांशीराम के बाद

बस यही समझ रहे थे कि बहुत ही जल्दी बहुजन समाज पार्टी पुरे देश पर राज करने वाली पार्टी बनेगी, लेकिन यह कोई नहीं जानता था कि विरोधी इसको लगातार खोखला कर रहे हैं और जड़ें काटने का भी काम जारी था बस एक मौका तलाश रहे थे और उनको मान्यवर कांशीराम साहब के परिनिर्वाण के बाद मौके ही मौके मिले। 2003 के बाद बहुजन समाज पार्टी जिस गति से उभर रही थी उसी गति से नीचे चली गई। कई बड़े बड़े नेता निकल गई और कई को निकाल दिया गया। आरोप प्रत्यारोप का दौर चलना शुरू कर दिया। साथ ही कांशीराम साहब के बाद वर्ग को छोड़कर जाति की राजनीति चालू हो गई। कई घर बर्बाद हो गए। कई लोग सड़कों पर आ गए, क्योंकि सुनने और समझाने वाला कोई नहीं बचा। नेता बनाने की फैक्ट्री बंद हो गई। बामसेफ संघठन अलग हो गया। कई बड़े बड़े नेताओं ने अपने छोटे-छोटे दल बना कर राजनीति करने लगे। कुछ लोग मान्यवर कांशीराम साहब के श्रध्दा के चलते आज भी पार्टी में जुड़े हैं और वोट करते हैं। इसलिए बहुजन समाज पार्टी टिकी हुई है। केडर बंद हो गए लोग वही टीवी बीवी में मस्त रहने लगे, नेताओं को इधर उधर से सहारा और इशारा मिलने लगा।

विरोधी लोग पार्टी में अंदर तक घुस गए और आज बहुजन समाज पार्टी उस दौर पर खड़ी जहां उसको होना नहीं चाहिए था। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव के नतीजे आपके सामने है। बहन जी कुमारी मायावती जी को पार्टी के समर्थक सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री बनाने के पोस्ट करते हैं। बात करते हैं और कांशीराम साहब की बातें करते हैं लेकिन उनके रास्ते में नहीं चलते हैं। पार्टी पर आरोप लगना शुरू हो गए। अम्बेडकर और कांशीराम साहब के नाम की माला जपते हुए समाज को धोखे में रखे हुए हैं। चुनाव में प्रत्याशी घोषित करते हैं और नामांकन से पहले ही वहां बिक जाती है या घर बैठ जाता है। आज कई विधानसभा में उम्मीदवार मिलना मुश्किल हो गया है और कहीं तो केवल मजबुरी में प्रत्याशी बन जाते हैं कि सीट खाली न रहे। चुनाव जिताने व जितने की कोई ललक नहीं है, केवल नाम चलाना है। यहां हाल सभी एससी एसटी के संगठन और पार्टियों का है सबके कुएं खाली पड़े हैं लेकिन कोई एक दुसरे के साथ आना नहीं चाहते हैं और इसमें समाज ठगा महसूस कर रहा है। जब तक सभी एक साथ नहीं आएंगे कोई भी हुक्मरान नहीं बन सकता चाहे वो कितना ही बड़ा नेता क्यों न हो?

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